भारतीय IT सेवा कंपनियों के शेयर मंगलवार को निवेशकों के फोकस में रह सकते हैं, क्योंकि अमेरिकी अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की फीस को रद्द कर दिया है। इस फैसले को भारतीय IT कंपनियों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बोस्टन की अमेरिकी जिला अदालत के जज लियो सोरोकिन ने कहा कि H-1B याचिकाओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाना ऐसा कर (टैक्स) है, जिसके लिए अमेरिकी कांग्रेस से वैधानिक अनुमति नहीं ली गई थी। यह मामला 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल द्वारा दायर मुकदमे के बाद सामने आया।
H-1B वीजा प्रोग्राम अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कुशल पेशेवरों की नियुक्ति की अनुमति देता है। भारतीय IT इंजीनियरों की बड़ी संख्या इसी व्यवस्था के तहत अमेरिका में काम करती है। ट्रंप प्रशासन के प्रस्तावित नियम में प्रति H-1B कर्मचारी 1 लाख डॉलर की वार्षिक फीस का सुझाव दिया गया था, जिसका उद्देश्य विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करना था।
यदि यह नियम लागू होता, तो भारतीय कंपनियों जैसे Tata Consultancy Services, Infosys, HCL Technologies, Wipro और Tech Mahindra की परिचालन लागत बढ़ सकती थी। इससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ने के साथ कंपनियों को अपने ऑनसाइट और ऑफशोर डिलीवरी मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता था।
विश्लेषकों का मानना है कि अदालत का फैसला मौजूदा बिजनेस मॉडल को सुरक्षित रखने में मदद करेगा, जिससे भारतीय IT कंपनियां अपनी लागत प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रख सकेंगी। इससे निवेशकों की धारणा पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस बीच AI आधारित अवसरों को लेकर भी उद्योग में सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में Cognizant के CEO ने कहा कि एजेंटिक AI के बढ़ते उपयोग से IT और बिजनेस प्रोसेस सेवाओं का संभावित बाजार लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 5–6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह संकेत देता है कि पारंपरिक IT सेवाओं के साथ AI आधारित मांग आने वाले वर्षों में उद्योग के लिए नया विकास इंजन बन सकती है।

