सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज ड्यूटी में बड़ा कटौती किया है। पेट्रोल पर यह टैक्स ₹13 प्रति लीटर से घटाकर ₹3 कर दिया गया है, जबकि डीज़ल पर पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है। इस कदम से देश की तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों – HPCL, BPCL और IOCL – निवेशकों की नजरों में आ गई हैं।
तेल कंपनियों के लिए यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि एक्साइज ड्यूटी घटने से उन्हें ईंधन सप्लाई करने की लागत कम हो जाती है। चूंकि पंप पर कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, कंपनियां यह बचत सीधे अपने मुनाफे में जोड़ सकती हैं। इसे ही मार्केटिंग मार्जिन कहा जाता है। अधिक मार्जिन का मतलब है बेहतर नकदी प्रवाह और मजबूत बैलेंस शीट।
हालांकि, इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का रहा है। मध्य पूर्व में तनाव और $120 प्रति बैरल तक तेल की बढ़ती कीमतों के कारण, कंपनियां हर लीटर पर नुकसान में जा रही थीं। जब कच्चा तेल $100 प्रति बैरल से ऊपर जाता है और पंप कीमतें स्थिर रहती हैं, तो कंपनियों को “अंडर-रिकवरी” का सामना करना पड़ता है। एक्साइज ड्यूटी कट इससे राहत तो देता है, लेकिन पूरी समस्या हल नहीं करता।
वित्तीय स्थिति की बात करें तो BPCL सबसे मजबूत है, जिसका नेट डेब्ट-टू-इक्विटी अनुपात 0.3 है। IOC का अनुपात 0.8 है, जबकि HPCL सबसे अधिक कर्ज में है, 1.4 गुना। इसका मतलब है कि HPCL कच्चे तेल की कीमतों और मार्जिन के उतार-चढ़ाव के प्रति सबसे संवेदनशील है।
उपभोक्ताओं को फिलहाल पेट्रोल या डीज़ल सस्ता होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पूर्व HPCL चेयरमैन MK सुराना के अनुसार, कंपनियां अभी भी कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण नुकसान में ईंधन बेच रही हैं।
संक्षेप में, एक्साइज ड्यूटी कट तेल कंपनियों के लिए राहत और मार्जिन बढ़ाने वाला कदम है, लेकिन जब तक कच्चा तेल महंगा रहेगा, अंडर-रिकवरी की समस्या बनी रहेगी।

